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क्या है युद्ध में विजय का तात्पर्य

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युद्ध में विजय का तात्पर्य ही यही था कि विरोधी देश की मातृ-शक्ति को हासिल कर उनकी कोख से विजेता की संतान को जन्म दिलाना..!
ह्रदय भी इसी से परिवर्तित होता था..! और विजेता होने की थाप भी इसी से लगती थी..!
बहुतेरे राज दरबारों ने यह थाप लगवायी भी थी..!!..और विजेता के सहगामी बनने का झूठा गर्व करते रहे..!!
लेकिन राजस्थानी क्षत्राणियां इसे स्वीकार करने के स्थान पर स्वयं को ही समारोह पूर्वक समाप्त कर देतीं थी।
देशों के मध्य वर्चस्व की जंग में कदाचित आज भी ऐसा ही होता है।
…लेकिन समूची “पद्मावत” में करणी सेना के विरोध का कोई तो घटक मिलता..?
इतने सधे तरीके से राजपूतो के शौर्य को बखान करने के लिए इसे पुरस्कृत करने के स्थान पर विरोध करना..!

”सरहदें तो बहुत फैला लीं
इस बार बांहें फैला लें
एक युद्ध इश्क के भी नाम सही ..!”
सचमुच …!खिलजी के रूप में रणवीर ने फिल्म लूट ली…!!

इस फ़िल्म को देखकर जहाँ आधुनिक नारी की प्रतिक्रिया सपाट सी है कि पद्मावती के पास अन्य विकल्प भी थे उसने जौहर जैसा आत्मघाती फैसला कर कायरता की थी यदि वह अन्य विकल्पों की ओर देखती तो इतिहास कुछ और होता।
उन सब के लिए मेरा उत्तर है कि रानी पद्मावती ने भले चित्तौड़ के राजा रतन सिंह के सानिध्य में कुछ कम समय बिताया हो, उसकी संतान को न जना हो, लेकिन उसे चाहने के बाद उसे पाया इसलिए अपने को समाप्त करने जैसा फैसला करने में उसने कोई मानसिक युद्ध नहीं लड़ा।
“…कदाचित आज भी ऐसा ही होता है”
दो अपरिचित विपरीत विचारों वाले व्यक्तियों को विवाह के नाम पर एकांत देकर छोड़ दिया जाता है…!
मादा की कोख से नर की संतान जनने के लिए..!
दिल्ली-चित्तौड़ जैसा युद्ध यहाँ भी होता है, मन के मैदान में..!
कई बार भौतिक, जो दिखलाई भी पड़ता है और अक्सर वैचारिक तो होता ही है…!.
अंततः संतान जन्म ले लेती है और…
लेकिन युद्ध जारी रहता है…लेकिन संतानोत्पति से ह्रदय परिवर्तित होता है….प्रेम बढ़ता है….लेकिन युद्ध का दायरा कसता चला जाता है…
ताउम्र दोनों स्वयं को अपराजित अथवा विजयी घोषित नहीं कर पाते
…लेकिन समाज स्वतः घोषित करता है .”.सफल दाम्पत्य..”
सच है मगर कड़वा है..!

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